विश्व
बंजारा दिवस: श्री. डी. रामा नाईक की भारत में इसे प्रथमतः आयोजन करने की ऐतिहासिक
पहल!
- प्राचार्य डॉ. दिनेश सेवा राठोड
(लेखक,
महाराष्ट्र राज्य) मो- +91 9404372756
____________________________________________________________________________________
बंजारा समाज ने भारत के इतिहास, संस्कृती और
व्यापारिक परंपरा में बहुत बड़ा योगदान दिया है। देश और धर्म के विकास में बंजारा
समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। एक ऐसे समय में जब देश में आधुनिक परिवहन
व्यवस्था नहीं थीं, बंजारा समाज ने अपनी कड़ी मेहनत और हिम्मत के दम पर देश-विदेश
के अलग-अलग हिस्सों में ज़रूरी चीज़ें आपूर्ति करके देश के व्यापार और सामाजिक
जीवन दोनों को मज़बूत किया है। बंजारों की लोक परंपराएं, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाज को समृद्ध बनाने
के साथ उनका योगदान भारत देश की सांस्कृतिक विरासत का एक अहम स्रोत रहा हैं जो हम
सभी के लिए यह प्रेरणादायक है। पिछले एक दशक से, "विश्व बंजारा दिवस"
दिन पूरे भारत में मतलब और प्रतीकात्मक रूप से मनाया जा रहा है, जो पूरे देश में
फैले बंजारा समाज के बीच एकता और भाईचारे को मज़बूत करने के साथ-साथ उनकी
समृद्ध भाषा, साहित्य , संस्कृती, व्यापार
की नीती और विकास को भी बढ़ावा देता है।
बंजारा समाज
के रोमा समुदाय के साथ गहरे
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं, जो
रोमा समुदाय के लोग अलग-अलग यूरोपियन देशों में फैले हुए हैं। देश ही नहीं,
विदेशों में भी बंजारा समुदाय हर जाति और धर्म में विद्यमान है। देश- विदेश में यह
बंजारा समाज कई नामों से जाना जाता है। जैसे युरप में जिप्सी, रोमा आदि..1990 से,
दुनिया भर में रोमा समुदाय 8 अप्रैल को आंतरराष्ट्रीय रोमा दिवस (इंटरनेशनल रोमा
डे) के तौर पर मनाते हैं; इस दिन को मनाने का मकसद यह अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाना, उनके सामने आने वाली चुनौतियों
के बारे में जागरूकता बढ़ाना, भेदभाव और अलग-थलग भाव-भावना के संदर्भ में किए
बातों का विरोध करना है। अपनी अलग पहचान और एकता के निशान के तौर पर, रोमा समुदाय
ने अपना झंडा और राष्ट्रगान भी अपनाया है, जो उनकी सामूहिक ताकत और हिम्मत का यह
एक प्रतीक माना जाता है। हम बंजारा, यद्यपि रोमा समुदाय के पूर्वज हैं, फिर भी इस
घटना से काफी हद तक अनभिज्ञ रहे हैं, जबकि यह घटना हमारे संघर्षों से भी गहराई से
जुड़ी हुई है।
रोमा समुदाय को अक्सर बंजारा समाज की पुरखों की
जड़ें माना जाता है और भारत के बंजारों के साथ उनके गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक
संबंध हैं। बंजारा भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं। अनुमान
लगाया जाता है की, भारत में लगभग 15 करोड़ बंजारे हैं और दुनिया भर के 64 देशों
में उनकी संख्या काफी मानी जाती है। इसके बावजूद, भारत में, आज भी उनकी
सामाजिक-आर्थिक स्थिति को विदेशों में बसे रोमा समुदायों की तरह ही कई चुनौतियों
का सामना करना पड़ रहा है। ऐतिहासिक रूप से, बंजारे आत्मनिर्भरता और सम्मान वाली
ज़िंदगी जीते थे, हालाँकि, ब्रिटिश शासन के तहत, उन्हें 'आपराधिक जनजाति अधिनियम' इस कानून ने उन्हें खानाबदोश जीवन शैली अपनाने
पर मजबूर कर दिया गया और उन्हें उनके पारंपरिक कामों-व्यापार और रोजी-रोटी के
साथ-साथ ज़मीन, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सम्मान जैसे बुनियादी
अधिकारों से भी उन्हें वंचित कर दिया गया। ऐसे मुश्किल हालात के बावजूद, बंजारा
समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में ज़बरदस्त हिम्मत दिखाई है।
"वल्ड बंजारा डे" अर्थात विश्व बंजारा दिवस हमारे पूर्वजों के संघर्षों
और बलिदानों को याद करने, समुदाय के पुनर्निर्माण और विकास के लिए हमारे सामूहिक
इरादे को पक्का करने का मौका देता है। यह आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए
एकता, आत्मनिरीक्षण और पहले से कोशिशों की ज़रूरत पर ज़ोर देता है।
रोमा और बंजारा समुदायों के बीच गहरे रिश्तों को
पहचानते हुए, श्री. डी. रामा नाईक (बेंगलुरु) (AIBSD के
नेशनल एग्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट) ने यूरोप में रोमा समुदाय तक अपनी पहुंच बनाने के
बाद, 2016 में पहली बार उन्होंने भारत में "वर्ल्ड रोमा बंजारा डे"
आयोजित करने की पहल की। उन्होंने
बंजारा समुदाय के रोमा लोगों से जुड़ाव के बारे में इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में
हिस्सा लिया है और भारतीय समुदाय का हिस्सा माने जाने की वकालत की है। सन 2025 में
श्री. डी. रामा नाईक को कन्नड़ भाषा में बंजारा जनजाति के इतिहास, संस्कृति, रीति-रिवाजों,
अनुष्ठानों और संघर्ष पर रचित उनकी साहित्यकृती 'महाचलन'- (महान आंदोलन) Proud
to be a Banjara के लिए कर्नाटक सरकार द्वारा स्थापित 'साहित्य
अकादमी पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया है।
श्री.
डी. रामा नाईक को रोमा-बंजारा की खोज में, आनुवंशिकी और भाषाविज्ञान के
संदर्भ में इस बात के बहुत सारे सबूत मिले हैं कि रोमा असल में उत्तरी भारत के
हैं। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि उनके पूर्वज यूरोपियन लोगों के साथ मिले थे, जबकि
रोमा- जिप्सी भारतसे ही थे। दोनों समुदाय में दिखने, काम, रंग, संस्कृती और सामाजिक जीवन में कई समानताएं हैं।उनके रीति-रिवाज़ और
तौर-तरीके भारत बंजारा लोगों की सांस्कृतिक विरासत से मिलते-जुलते है। भारत और
रोमा समुदाय के बीच के संबंध पारंपरिक भारतीय मूल्य प्रणाली पर आधारित हैं और सदियों
पुराने हैं। कई रोमा विद्वानों और इतिहासकारों का, जो अपनी उत्पत्ति पर शोध करने
में लगे हैं, मानना है कि उनकी जड़ें भारत
में ही हैं।
इसी जिज्ञासा के साथ हाल ही में श्री. डी. रामा
नाईक ने हमारे रोमा बंजारा भाइयों की खोज में चार देशों; जैसे हंगरी, सर्बिया,
बुल्गारिया और रोमानिया का दौरा किया। ज़्यादातर उन्होंने बाल्कन और
ट्रांसिल्वेनिया प्रांत का दौरा किया जहाँ रोमा लोग ज़्यादा संख्या में हैं और
उन्होंने इन देशों के 11 शहरों का दौरा किया, उन्हें चार भाषाएँ, चार करेंसी मिलीं
और उन्होंने रास्तों से लगभग 3000 कि. मी. का सफर तय किया। उन्होंने 19 जुलाई 2016
को हंगरी के बुडापेस्ट में यूरोपियन रोमा राइट सेंटर का भी दौरा किया और एडवोकेसी
ऑफिसर मिस्टर ज़ावित बेरिसा और मिस्टर अतानास ज़्रारिएव से मुलाकात की। उन्होंने
उनके साथ एक घंटे तक बातचीत की। ERRC एक इंटरनेशनल पब्लिक इंटरेस्ट लॉ ऑर्गनाइज़ेशन है जो स्ट्रेटेजिक
लिटिगेशन, रिसर्च और पॉलिसी डेवलपमेंट, एडवोकेसी और ह्यूमन राइट्स एजुकेशन के
ज़रिए रोमा लोगों के एंटी-रोमानी रेसिज़्म और ह्यूमन राइट्स के हनन से लड़ने के
लिए काम कर रहा है। इस सेंटर ने 500 से ज़्यादा कोर्ट केस लड़े हैं और रोमा लोगों
के साथ हुए हनन के लिए दो मिलियन यूरो (रूपये -15 करोड़ 20 लाख) से ज़्यादा का
मुआवज़ा दिलाया है। 20 जुलाई को, उन्होंने द रोमेडिया फ़ाउंडेशन का दौरा किया और
एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मिसेज़ कैटलिन बसरोनी और उनके साथियों से मिले। यह
फ़ाउंडेशन बुडापेस्ट में एक रोमानी नॉन-गवर्नमेंटल ऑर्गनाइज़ेशन है। यह रोमानी
एथनिक आइडेंटिटी की पॉज़िटिव सोच में योगदान देने, एंटी-रोमा भेदभाव से लड़ने और
पॉलिसी मेकर्स को अलग-अलग तरीकों से दूसरी जानकारी देने की दिशा में काम करता है।
अपनी चर्चा के दौरान उन्होंने पहले महाराष्ट्र राज्य के पद्मश्री पुरस्कार विजेता
स्वर्गीय श्री. रामसिंह भानावत का ज़िक्र किया,क्योंकि पद्मश्री रामसिंहजी भानवत
ने पश्चिमी यूरोपीय संस्कृति और भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत के बीच
सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से वैश्विक संस्कृति को समृद्ध बनाने और
सांस्कृतिक पहचान को आकार देने में अमूल्य योगदान दिया है। वे 1971 में लंदन में
हुई रोमा कांग्रेस में शामिल हुए थे, और साथ ही श्री. डी. रामा नाईकने AIBSS और (NBPA) नेशनल बंजारा
प्रोफ़ेसर ऑर्गनाइज़ेशन की भूमिका और मकसद के बारे में भी उन्हें बताया। उन्होंने
26 जुलाई, 2016 को बुखारेस्ट में रोमानियाई पार्लियामेंट का दौरा किया और वे तीन
रोमा MPs से भी मिले। 1. वोइकू मैडलिन स्टीफन, 2. पॉन
निकोले, 3. डेमियन ड्राघिसी। इ.
शुरू में, इस "विश्व बंजारा दिवस" को
मनाने की शुरुआत देश की नदियों और समुद्रों में फूल चढ़ाने और एक-दूसरे के बीच
शुभकामनाओं का लेन-देन करने के एक साधारण लेकिन प्रतीकात्मक इशारे के तौर पर हुई
थी। समय के साथ, यह दिन इन समुदायों की एकता और सामूहिक पहचान का एक शक्तिशाली
प्रतीक बन गया है, जो देश की सीमाओं को पार करता है। इसके अलावा, श्री. डी. रामा
नाईक के दूरदर्शी नज़रिए से, इस पहल से "इंटरनेशनल बंजारा रोमा
ऑर्गनाइज़ेशन" (IBRO) बना, जिसने बंजारा और रोमा
के वैश्विक सांस्कृतिक रिश्तों को और मज़बूत किया। पिछले कुछ सालों में, श्री. डी.
रामा नाईकने कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में कई
प्रोग्राम, सेमिनार और कॉन्फ्रेंस आयोजित किए
है; इन इवेंट्स में इंटरनेशनल रोमा प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस साझा
ग्लोबल पहचान को उन्होंने और मज़बूत किया है।
6वां नेशनल बंजारा प्रोफेसर्स असोशिऐशन और 'रोमा-बंजारा' पर पहला अंतर्राष्ट्रीय
सेमिनार 7 अक्टूबर, 2017 को इंदौर, मध्य प्रदेश में आयोजित किया गया था। सबसे
महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्व रोमा संगठन के अध्यक्ष श्री. जोवेन डैमजोनोविक,
महासचिव श्री. बजराम हलीती, सर्बिया की श्रीमती. तिजाना टोडोरोविक और क्रोएशिया की
श्रीमती. अंका डलिपॉव्स्की इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का हिस्सा थे। चूँकि मैं खुद
'नेशनल बंजारा प्रोफेसर्स असोशिऐशन' का महाराष्ट्र राज्य अध्यक्ष होने के नाते,
मुझे व्यक्तिगत रूप से इंदोर के इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में और 'विश्व बंजारा दिवस'
के कुछ समारोहमें श्री डी. रामा नाइक और डॉ. पंडित चव्हाण (नांदेड़) के साथ शामिल
होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
समय के साथ और भारत में लोगों में इसे ज़्यादा
से ज़्यादा पहचान दिलाने के मकसद से, इस दिन को "विश्व बंजारा दिवस" के
नाम से जाना जाने लगा, जबकि रोमा समुदाय से इसका सबंध सम्मान के साथ बना रहा।
लगातार कोशिश, लगन और एक साफ़ नज़रिए से, यह आंदोलन आज राष्ट्रीय स्तर पर एकता और
यह सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया है। इस दिन का मकसद बंजारा समुदाय के इतिहास
और सांस्कृतिक योगदान को दिखाना है,
जिन्होंने शुरुआती समय में भारत की व्यापारिक परंपराओं में एक अहम भूमिका निभाई थी।
श्री. डी. रामा नाईक का इस दिन को शुरू करने का सपना, जो भारत के इतिहास,
संस्कृती और व्यापार में बंजारा समुदाय की अहमियत को दिखाने के लिए था, जबकि आज यह
पूरा हो रहा है। इस दिन का मकसद बंजारा समाज के ऐतिहासिक योगदान को बढ़ावा देना और
उन्हें सही पहचान देना है। बंजारा समुदाय ने पूरे इतिहास में अनेक कठिनाइयों का
सामना किया है; फिर भी, उनका आत्म-सम्मान, कड़ी मेहनत और दृढ़ता उन्हें सदैव उच्च
सम्मान दिलाते रहे हैं। 'विश्व बंजारा दिवस' उनके संघर्ष और विजय के प्रति सम्मान
का प्रतीक है।
8 अप्रैल सिर्फ़ जश्न का दिन नहीं है, न ही यह
किसी की अपनी इच्छाओं या राजकीय एजेंडा के
लिए कोई प्लैटफ़ॉर्म है। यह "संकल्प का दिन" है, रोमा-बंजारा समुदाय की
साझी विरासत को फिर से बनाने का दिन, और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस समृद्ध
विरासत को सम्मान के साथ बचाकर रखने का पक्का वादा समझा जाता है। भारत में, इंडियन
काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस और इंडियन काउंसिल फॉर इंटरनेशनल को-ऑपरेशन भी हर साल
नई दिल्ली में रोमा डे का आयोजन किया जाता हैं। इस साल-2026 में दिल्ली सरकार 8
अप्रैल को वर्ल्ड बंजारा डे के मौके पर एक बड़ा इवेंट करने जा रही है ताकि देश भर
में व्यापार, संस्कृति और सामाजिक जीवन में बंजारा समुदाय के ऐतिहासिक योगदान को
दिखाया जा सके। महाराष्ट्र सरकार और अन्य राज्य सरकार को भी बंजारों के
आत्म-सम्मान को दिखाने के लिए इस विश्व बंजारा दिवस को मनाने की पहल करनी चाहिए।
इस 'विश्व बंजारा दिवस' का उद्देश्य हमारे
सदियों पुराने विश्व-दृष्टिकोण 'वसुधैव कुटुंबकम' के अनुरूप है, जिसका अर्थ है कि
पूरा विश्व एक परिवार है। भारत केवल भौतिक लक्ष्यों का पीछा करने वाला एक
व्यापारिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यहां के बंजारा समाजकी मूल्यों और दूरदृष्टि पर
आधारित एक ऐसी उनकी सभ्यतापुर्ण सांस्कृतिक
विरासत है जो सद्भाव को बढ़ावा देती है। भारतीय मूल के लोगों और उनके
कल्याण के प्रति हमारे मन में स्वाभाविक अपनापन और सरोकार रहना स्वाभाविक है।
देश भर के बंजारा समाज को विश्व बंजारा दिवस के
जश्न में बड़े जोश के साथ हिस्सा लेना चाहिए। आइए हम बंजारा संस्कृति, इतिहास और
योगदान का सम्मान करें और जश्न मनाएं। साथ ही, यह अधिकारों और समावेश की वकालत
करने और बंजारा समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियों और मुद्दों के बारे में
जागरूकता बढ़ाने का भी यह दिन है। आप सभी को विश्व बंजारा दिवस की शुभकामनाओं के
साथ...
जय सेवालाल – जय बंजारा….!!!